दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ शक्ति की परिभाषा फिर से लिखी जा रही है। कभी राष्ट्रों की ताकत सेनाओं, सीमाओं, तेल, कारखानों, बंदरगाहों, समुद्री मार्गों और धन-सम्पदा से आँकी जाती थी, पर अब एक नई अदृश्य शक्ति मानव सभ्यता के बीच प्रवेश कर रही है। यह शक्ति है कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)। यह केवल कम्प्यूटरों या प्रयोगशालाओं की चीज़ नहीं रह गई है। यह खेतों, स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों, बैंकों, सरकारी दफ्तरों, उद्योगों, सुरक्षा-व्यवस्था, कूटनीति और साधारण नागरिक के मोबाइल तक पहुँच रही है। आने वाले समय में वही राष्ट्र अधिक प्रभावशाली होंगे जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल मशीन की तरह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और वैश्विक नेतृत्व के साधन के रूप में समझेंगे। भारत के लिए यह क्षण केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है; यह सभ्यतागत अवसर है।